बैलगाड़ी से गांव पहुंचकर जगाई शिक्षा की अलख

शिक्षक दिवस पर विशेष- इस शिक्षक ने साधारण स्कूल में पढ़ाने के दौरान तैयार कर दिए थे कई जवान

वर्तमान में देश के विभिन्न सुरक्षा बलों में पदस्थ इस शिक्षक के तैयार किए छात्र

रिटायर्ड होने पर जुटे थे 250 जवान 20 किमी पैदल चलकर भेंट की थी स्कूटी

खेल मैदान पर आज भी बच्चों को देते हैं मार्गदर्शन

परवेज खान की खास रिपोर्ट
बैतूल। यूं तो वे गांव के स्कूल के एक साधारण शिक्षक थे, लेकिन उनकी कार्य शैली ने न केवल उनके स्कूल को अलग नाम दिया बल्कि उनकी पहचान देश को सैनिक देने वाले शिक्षक के रूप में बन गई। यही वजह रही कि उनके विदाई समारोह में देशभर से उनके 2 सौ से ज्यादा पूर्व छात्र जुटे थे, जो देश के विभिन्न सुरक्षा बलों में पदस्थ है। जी हम बात कर रहे हैं बैतूल के रिटायर्ड शिक्षक हीरामन मालवीय की, वे अपने सेवा काल के दौरान बैतूल जिले के दूरस्थ अंचलों में पदस्थ रहे। इस दौरान वे ना केवल स्कूल में बच्चों को पाठ्यक्रम पढ़ाते थे बल्कि शरीरिक रूप से मजबूत बनाने के लिए सुबह- शाम फिजिकल ट्रेनिग भी देते थे। इसके अलावा वे छात्रों को आर्मी औऱ पुलिस समेत बलों में जाने के लिए प्रेरित भी करते थे। यही वजह रही कि पाढर के छात्रावास में अधीक्षक के रूप में पदस्थ रहने के दौरान वहां के आधा दर्जन छात्र एक साथ सेवा में चयन हुए थे। गांव का वह साधरण स्कूल एक सेना ट्रेनिंग स्कूल और सहायक शिक्षक हीरामन मालवीय एक सैनिक शिक्षक बन गए। इसके बाद जिस भी स्कूल में पदस्थ रहे वहां के बच्चे सेना,पुलिस समेत और अन्य सुरक्षा बालों में चयनित होते रहे । वर्तमान में उनके पूर्व छात्र सेना -पुलिस विभाग अन्य विभागों में पदस्थ है। इसके अलावा कई छात्र अधिकारी बने जो शिक्षक श्री मालवीय के प्रति बेहद कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। इसका एक उदाहरण सीआईएसएफ तमिलनाडु में पदस्थ सरवन परते औऱ खंडवा जिले के मत्यस्य विभाग में पदस्थ सहायक अधिकारी मनोज कवड़े है।

बैलगाड़ी से स्कूल पहुचकर जगाई शिक्षा की अलख

शिक्षक हीरामन मालवीय की प्रथम नियुक्ति जुलाई 1987 में सहायक शिक्षक के रूप में बैतूल जिले के सुदूर आदिवासी ग्रामीण अंचल ग्राम दामजीपुरा में हुई। उन दिनों बैतूल से भीमपुर तक दिनभर में मुश्किल से एक-दो बसें चलती थीं। भीमपुर से आगे लगभग 70 किलोमीटर की यात्रा अपने आप में एक चुनौती थी। संयोग से वन विभाग का कोई ट्रक मिल जाए तो यात्रा संभव होती, अन्यथा पैदल अथवा बैलगाड़ी ही सहारा थी। नई नियुक्ति के बाद इस संस्था में ज्वाइन करने के लिए श्री मालवीय ने अपने साथ एक माह का राशन लेकर यह लंबी यात्रा दो दिन में पैदल पूरी की। रहने के लिए बांस की खपच्चियों से बना झोपड़ीनुमा मकान था, लेकिन कठिन परिस्थितियां भी उनके उत्साह और कर्तव्यनिष्ठा को डिगा नहीं सकीं। उन्होंने स्कूल के छात्रों को खेलों में भी आगे बढ़ाया। इसके चलते स्कूल के छात्रों ने ब्लॉक ,जिला और संभाग से राज्य तक खेलों में अपना परिचय देते हुए खुद का और स्कूल का नाम रोशन किया।


विद्यार्थियों ने निकाला था 20 किमी पैदल जुलूस, स्कूटी की भेंट

31 जुलाई 2026 को श्री मालवीय सेवानिवृत्ति हुई, तब उनके जीवनभर के सेवाभाव का अद्भुत प्रतिफल देखने को मिला।देश के विभिन्न क्षेत्रों में सेना, पुलिस, अर्धसैनिक बल और प्रशासनिक सेवाओं में कार्यरत उनके लगभग 250 से अधिक छात्र-छात्राएं अपने मार्गदर्शक शिक्षक को सम्मानपूर्वक विदाई देने के लिए एकत्र हुए। उन्होंने पाढर छात्रावास से बैतूल तक लगभग 20 किलोमीटर का जुलूस निकालकर विदाई दी। इसके अलावा एक स्कूटी भी भेंट की गई।


सेवानिवृत्ति हुई, न की सेवा भाव नहीं

31 जुलाई 2026 को सरकारी सेवा से श्री हीरामन मालवीय जी अवश्य सेवानिवृत्त हुए, लेकिन उनके भीतर का शिक्षक आज भी पूरी तरह सक्रिय है। श्री मालवीय आज भी प्रातः मैदान में पहुंच जाते हैं और युवाओं को शारीरिक अभ्यास, दौड़ तथा अन्य गतिविधियों के लिए प्रेरित करते हैं। विद्यालयों, महाविद्यालयों और विभिन्न कोचिंग संस्थाओं में जाकर वे विद्यार्थियों से घंटों संवाद करते हैं।शिक्षा, स्वास्थ्य, अनुशासन, दैनिक दिनचर्या, समय की पाबंदी और सफलता के सूत्रों पर तीन-तीन, चार-चार घंटे तक मार्गदर्शन देना आज भी उनकी दिनचर्या का हिस्सा है।
उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उन्होंने अपनी इस सेवा के बदले कभी आर्थिक लाभ की अपेक्षा नहीं की। न किसी पुरस्कार की याचना की, न किसी सम्मान की आकांक्षा रखी।

पर्यावरण सेवा—एक मौन लेकिन अमिट अभियान

श्री हीरामन मालवीय जी के व्यक्तित्व का एक अत्यंत उल्लेखनीय पक्ष उनकी पर्यावरण सेवा भी है।अध्यापन कार्य से बचे समय में वे केवल विद्यालय परिसर में ही नहीं, बल्कि नगर, ग्रामीण क्षेत्रों और किसानों के खेतों में भी पौधारोपण करते रहे। उन्होंने फलदार, औषधीय तथा विलुप्त होती प्रजातियों के पौधों को लगाने और बचाने का निरंतर प्रयास किया। विशेष बात यह है कि उन्होंने पर्यावरण सेवा को कभी प्रचार का माध्यम नहीं बनाया।लोगों को पौधे उपलब्ध कराना, स्वयं पौधारोपण करके दिखाना, खाद की व्यवस्था बताना, पौधों की देखभाल की जानकारी देना और फिर समय-समय पर उनका फॉलोअप करना—यह सब उनके लिए किसी अभियान से अधिक एक जीवनशैली बन गया।
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  • PARVEJ KHAN

    District Reporter

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