कुकरू को पर्यटन नहीं, कॉफी बागानों की जरूरत है मोहन जी
समीक्षा राजेन्द्र सिंह जादौन की कलम से
बैतूल/भैंसदेही/भोपाल। मध्यप्रदेश के बैतूल जिले की भीमकाय पहाड़ियों और घने जंगलों के बीच बसा कुकरू-खामला क्षेत्र प्रकृति की एक अनमोल धरोहर है। वर्षों से यह इलाका अपनी प्राकृतिक सुंदरता, ठंडी जलवायु, हरियाली और शांत वातावरण के लिए जाना जाता रहा है। गर्मियों में भी यहां का तापमान प्रदेश के अन्य हिस्सों की तुलना में काफी कम रहता है, जिसके कारण इसे कई लोग मध्यप्रदेश का “कश्मीर” भी कहते हैं। पिछले कुछ समय से सरकार इस क्षेत्र को पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने की योजनाओं पर काम कर रही है, लेकिन एक बड़ा सवाल यह है कि क्या वास्तव में कुकरू को पर्यटन हब बनाने की आवश्यकता है, या फिर इसकी वास्तविक क्षमता को पहचानते हुए इसे कॉफी उत्पादन और कॉफी आधारित उद्योगों का केंद्र बनाया जाना चाहिए?

कुकरू की पहचान केवल उसकी प्राकृतिक सुंदरता नहीं है। यह क्षेत्र लंबे समय से कॉफी उत्पादन की संभावनाओं के लिए भी जाना जाता रहा है। यहां की जलवायु, मिट्टी और ऊंचाई कॉफी की खेती के लिए उपयुक्त मानी जाती है। स्थानीय किसानों और बुजुर्गों का कहना है कि इस क्षेत्र में पैदा होने वाली कॉफी की गुणवत्ता बेहद उत्कृष्ट होती है। कई जानकारों का मानना है कि यहां की कॉफी में स्वाद और सुगंध का एक अलग ही स्तर देखने को मिलता है। यदि वैज्ञानिक अध्ययन और सरकारी सहयोग मिले तो यह क्षेत्र देश के प्रमुख कॉफी उत्पादक क्षेत्रों में शामिल हो सकता है।
स्थानीय स्तर पर वर्षों से एक बात कही जाती रही है कि महाराष्ट्र के चिखलदरा क्षेत्र में कॉफी उत्पादन की शुरुआत के लिए पौधे इसी क्षेत्र से ले जाए गए थे। आज चिखलदरा देश के प्रमुख कॉफी उत्पादक क्षेत्रों में अपनी पहचान बना चुका है। वहां कॉफी खेती के कारण किसानों की आय बढ़ी है और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिली है। यदि पड़ोसी क्षेत्र इस मॉडल पर सफल हो सकता है, तो फिर कुकरू जैसे प्राकृतिक रूप से अनुकूल क्षेत्र में इस दिशा में गंभीर प्रयास क्यों नहीं किए जा रहे हैं?

आज सरकार पर्यटन को विकास का पर्याय मान रही है। निस्संदेह पर्यटन से रोजगार के अवसर पैदा होते हैं, लेकिन इसके साथ कई चुनौतियां भी जुड़ी होती हैं। पर्यटन के नाम पर सड़कों का विस्तार, होटल, रिसॉर्ट और व्यावसायिक गतिविधियां बढ़ती हैं। इससे प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बढ़ता है। जंगलों की कटाई, जल स्रोतों पर प्रभाव, कचरे की समस्या और भूमि का व्यावसायीकरण जैसी स्थितियां धीरे-धीरे सामने आने लगती हैं। जिन क्षेत्रों की पहचान प्राकृतिक शांति और हरियाली से होती है, वे कुछ वर्षों में भीड़भाड़ वाले व्यावसायिक केंद्रों में बदल जाते हैं।

कुकरू की सबसे बड़ी ताकत उसका प्राकृतिक संतुलन है। यहां की हरियाली, जैव विविधता और कृषि आधारित जीवनशैली ही इसकी वास्तविक पूंजी है। यदि इस क्षेत्र को बड़े पैमाने पर पर्यटन केंद्र में बदलने का प्रयास किया गया तो यह संतुलन प्रभावित हो सकता है। दूसरी ओर यदि यहां कॉफी आधारित कृषि और उद्योग विकसित किए जाएं तो विकास और पर्यावरण संरक्षण दोनों साथ-साथ चल सकते हैं।
कॉफी खेती एक ऐसी गतिविधि है जो जंगलों और पेड़ों के संरक्षण को भी बढ़ावा देती है। कॉफी के पौधे छायादार वातावरण में बेहतर विकसित होते हैं, इसलिए किसान पेड़ों को बचाने के लिए प्रेरित होते हैं। इससे पर्यावरण संरक्षण भी होता है और किसानों को आर्थिक लाभ भी मिलता है। यही कारण है कि दुनिया के कई देशों में कॉफी उत्पादन को टिकाऊ कृषि मॉडल के रूप में देखा जाता है।

मध्यप्रदेश सरकार यदि वास्तव में इस क्षेत्र का विकास चाहती है तो उसे कुकरू और आसपास के इलाकों में कॉफी मिशन प्रारंभ करना चाहिए। किसानों को उच्च गुणवत्ता वाले पौधे उपलब्ध कराए जाएं, कृषि वैज्ञानिकों की मदद से प्रशिक्षण दिया जाए और आधुनिक तकनीकों से खेती को बढ़ावा दिया जाए। इसके साथ ही कॉफी की प्रोसेसिंग और पैकेजिंग के लिए स्थानीय स्तर पर इकाइयां स्थापित की जाएं ताकि किसानों को केवल कच्चा उत्पाद बेचने पर निर्भर न रहना पड़े।
आज देश और विदेश में विशेष गुणवत्ता वाली कॉफी की मांग लगातार बढ़ रही है। यदि “कुकरू कॉफी” के नाम से एक अलग ब्रांड विकसित किया जाए तो यह क्षेत्र राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी पहचान बना सकता है। जिस प्रकार दार्जिलिंग की चाय और कूर्ग की कॉफी की अलग पहचान है, उसी प्रकार कुकरू भी अपनी विशिष्ट कॉफी के लिए जाना जा सकता है।
इसका सबसे बड़ा लाभ स्थानीय युवाओं को मिलेगा। वर्तमान में रोजगार के सीमित अवसरों के कारण ग्रामीण क्षेत्रों से युवाओं का पलायन जारी है। यदि कॉफी आधारित उद्योग विकसित होते हैं तो खेती, प्रसंस्करण, पैकेजिंग, विपणन और परिवहन जैसे क्षेत्रों में बड़ी संख्या में रोजगार के अवसर पैदा होंगे। इससे युवाओं को अपने क्षेत्र में ही काम मिलेगा और गांवों की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी।

एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि पर्यटन का लाभ अक्सर कुछ सीमित लोगों तक ही पहुंचता है, जबकि कृषि आधारित विकास का लाभ सीधे किसानों और ग्रामीण परिवारों तक पहुंचता है। कॉफी उद्योग विकसित होने पर हजारों छोटे और मध्यम किसान इससे जुड़ सकते हैं। उनकी आय में स्थायी वृद्धि होगी और आर्थिक आत्मनिर्भरता बढ़ेगी।
विकास का अर्थ केवल भवन निर्माण और पर्यटकों की संख्या बढ़ाना नहीं होता। वास्तविक विकास वह है जो स्थानीय संसाधनों, स्थानीय संस्कृति और स्थानीय लोगों की जरूरतों के अनुरूप हो। कुकरू की पहचान उसकी प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ उसकी कृषि संभावनाओं में भी छिपी हुई है। इसलिए यहां विकास का मॉडल भी उसी आधार पर तैयार किया जाना चाहिए।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और राज्य सरकार से क्षेत्र के किसानों, पर्यावरण प्रेमियों और स्थानीय नागरिकों की अपेक्षा है कि वे कुकरू को केवल पर्यटन परियोजना के रूप में देखने की बजाय इसकी कृषि क्षमता का भी गंभीर अध्ययन कराएं। यदि विशेषज्ञों की समिति बनाकर कॉफी उत्पादन की संभावनाओं का मूल्यांकन किया जाए तो यह क्षेत्र मध्यप्रदेश की नई आर्थिक पहचान बन सकता है।

कुकरू को कंक्रीट के जंगलों और व्यावसायिक पर्यटन के दबाव में लाने की बजाय यदि कॉफी बागानों, कृषि अनुसंधान केंद्रों और किसान आधारित उद्योगों का क्षेत्र बनाया जाए तो यह विकास का अधिक संतुलित और टिकाऊ मॉडल साबित होगा। इससे पर्यावरण भी सुरक्षित रहेगा, किसानों की आय भी बढ़ेगी और क्षेत्र की मौलिक पहचान भी बनी रहेगी।
आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकार केवल पर्यटन के सपने न दिखाए, बल्कि उन संभावनाओं को भी पहचाने जो वर्षों से इस धरती में मौजूद हैं। कुकरू की पहाड़ियां, यहां की मिट्टी, यहां की जलवायु और यहां के किसान एक नई कृषि क्रांति की नींव बन सकते हैं। यदि सही नीतियां और सही दिशा मिले तो आने वाले वर्षों में कुकरू केवल एक हिल स्टेशन नहीं बल्कि देश का एक महत्वपूर्ण कॉफी उत्पादन केंद्र बनकर उभर सकता है।
शायद यही वह रास्ता है जो कुकरू को स्थायी विकास, रोजगार और समृद्धि की ओर ले जाएगा।







