एक तरफ नवागत कलेक्टर के सख्त निर्देश जनसुनवाई में लोगों की समस्याओं का समाधान करें दुसरी तरफ कुर्सियां खाली
आमला। जनता की समस्याओं के त्वरित निराकरण के लिए शुरू की गई ‘जनसुनवाई’ अब महज एक सरकारी औपचारिकता बनकर रह गई है। कभी फरियादियों की भारी भीड़ से गुलजार रहने वाले जनसुनवाई कक्ष में अब सन्नाटा पसरने लगा है। आलम यह है कि मंगलवार को आयोजित होने वाली इस प्रक्रिया में अब जनता से ज्यादा विभागों के अधिकारी और कर्मचारी नजर आते हैं। अभी नवागत कलेक्टर डॉ. सौरभ संजय सोनवणे ने जनसुनवाई में आये आम जनता की समस्याओं के प्रकरणों को त्वरित और सख्ती के साथ निपटारा कराने के निर्देश दिये है। आगे यहां सख्त निर्देश कितने प्रभावी रहेंगे देखा जायेगा।

शिकायतकर्ता या फरियादी गायब, सिर्फ कुर्सियां शेष
कुछ समय पहले तक आमला जनपद कार्यालय में जनसुनवाई के दौरान पैर रखने की जगह नहीं होती थी। दूर-दराज के गांवों से लोग बड़ी उम्मीदें लेकर अपनी शिकायतें दर्ज कराने पहुँचते थे। लेकिन वर्तमान स्थिति इसके उलट है। अब जनसुनवाई के दौरान हॉल में अधिकारियों से कुर्सी तो भरी रहती है। पर कतार में भींड खड़ी नहीं दिखती हैं, आजकल अपनी समस्या सुनाने वाली आम जनता वहां से नदारद है।

क्यों उठ रहा है जनता का भरोसा?
स्थानीय लोगों और जानकारों की मानें तो इस घटती संख्या के पीछे मुख्य कारण निराकरण की कछुआ चाल है।
शिकायतों का अंबार, समाधान शून्य: कई ग्रामीणों का कहना है कि वे महीनों तक चक्कर काटते हैं, लेकिन उनकी फाइल एक टेबल से दूसरे टेबल तक ही घूमती रहती है।
फीडबैक की कमी: आवेदन देने के बाद आवेदक को यह भी पता नहीं चलता कि उसकी समस्या पर क्या कार्रवाई हुई।
अधिकारियों का टालमटोल:
कई बार बड़े अधिकारियों की अनुपस्थिति और कनिष्ठ कर्मचारियों के भरोसे छोड़ दी गई जनसुनवाई से जनता में निराशा बढ़ी है।
अधिकारी-कर्मचारियों की ‘निजी बैठक’
वर्तमान में जनसुनवाई का दृश्य किसी विभागीय बैठक जैसा प्रतीत होता है। एक तरफ राजस्व, जनपद, वन विभाग, शिक्षा, बिजली विभाग और नगर पालिका के अधिकारी अपनी फाइलों के साथ तैयार रहते हैं, लेकिन आवेदक के न पहुँचने से वे भी आपस में चर्चा कर समय काटते नजर आते हैं।

”जब बार-बार आवेदन देने के बाद भी समस्या जस की तस बनी रहती है, तो गरीब आदमी अपना काम छोड़कर और किराया लगाकर जनपद कार्यालय क्यों आए? जनसुनवाई अब सिर्फ कागजों पर ही ‘जन’ की रह गई है।”
गिनती के आवेदन पहुंचे जनसुनवाई में
जनसुनवाई के दौरान करीब नौ आवेदन ही आये जिसमें मुख्य रूप से
सीमांकन के दो, कर्मकार के एक, नीजी कब्जा हटाने एक ओर अन्य मामलों के पांच आवेदन प्राप्त हुए हैं।
यदि प्रशासन चाहता है कि जनसुनवाई में जनता का विश्वास फिर से बहाल हो, तो केवल आवेदन लेना काफी नहीं है। शिकायतों के समयबद्ध निराकरण और जवाबदेही तय करने की सख्त जरूरत है। वरना, करोड़ों रुपये खर्च कर चलाई जा रही यह व्यवस्था केवल सरकारी आंकड़ों तक ही सीमित रह जाएगी।
एसडीएम ने जनपद कार्यालय का निरीक्षण किया
एसडीएम बड़ोनिया द्वारा जनसुनवाई के पहले जनपद कार्यालय का निरीक्षण किया था। शायद जनसुनवाई कक्ष के समीप शौचालय की बदबू एसडीएम महसूस नहीं कर पाये। क्या एसडीएम केवल नवागत कलेक्टर के आदेश की खानापूर्ति में लगे है?
नवागत कलेक्टर डॉ सौरभ संजय सोनवणे ने अधिकारियों को निर्देशित किया कि जनसुनवाई में प्राप्त आवेदनों का त्वरित निराकरण सुनिश्चित करें, ताकि आम नागरिकों को अपनी समस्याओं के समाधान के लिए जनसुनवाई में दोबारा न आना पड़े। उन्होंने सख्त निर्देशित किया कि आवेदनों के निराकरण में लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।







