नई दिल्ली। यह किस्सा है साल 2005 का, जब पाकिस्तान के तत्कालीन जनरल परवेज मुशर्रफ भारत दौरे पर आए थे। चर्चा ये थी कि जब मुशर्रफ राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम से मिलेंगे तो निश्चित रूप से ‘कश्मीर’ का मुद्दा उछालेंगे।
मुलाकात से ठीक एक दिन पहले, कलाम साहब के सचिव पी.के. नायर साहब थोड़े चिंतित थे। उन्होंने कलाम साहब के पास जाकर धीरे से कहा— “सर, मुशर्रफ कल ज़रूर कश्मीर का राग अलापेंगे, आपको इसके लिए मानसिक रूप से तैयार रहना चाहिए।”
अब्दुल कलाम साहब, जिनके चेहरे पर हमेशा एक सौम्य मुस्कान रहती थी, एक क्षण के लिए रुके। उन्होंने नायर साहब की आंखों में देखा और बड़े आत्मविश्वास से कहा— “उसकी चिंता आप मत कीजिए, मैं सब संभाल लूंगा।”
अगले दिन जो हुआ, वह इतिहास बन गया!
जैसे ही मुलाक़ात शुरू हुई, डॉ. कलाम ने फ्रंट फुट पर मोर्चा संभाला। उन्होंने किसी राजनीतिक विवाद या सीमा विवाद पर बात करने के बजाय, मुशर्रफ को अपने ड्रीम प्रोजेक्ट ‘PURA’ (Providing Urban Amenities to Rural Areas) के बारे में बताना शुरू किया।
अगले 30 मिनट तक कलाम साहब एक राष्ट्रपति की तरह नहीं, बल्कि एक विजनरी वैज्ञानिक और शिक्षक की तरह मुशर्रफ को यह समझाते रहे कि कैसे आने वाले 20 सालों में भारत और पाकिस्तान अपने गांवों का विकास करके गरीबी को जड़ से मिटा सकते हैं।
उन्होंने नक्शों और डेटा के जरिए विकास का ऐसा खाका खींचा कि मुशर्रफ को कश्मीर शब्द बोलने का मौका ही नहीं मिला।
मुलाकात के बाद जब मुशर्रफ बाहर निकले, तो उनके तेवर बदले हुए थे। उन्होंने बेहद सम्मान के साथ कहा— “धन्यवाद राष्ट्रपति महोदय! भारत देश वाकई बहुत किस्मत वाला है कि उसके पास आप जैसा एक महान वैज्ञानिक राष्ट्रपति है।”
यह थी डॉ. कलाम की ताकत। उन्होंने दिखा दिया कि विवादों को सुलझाने का सबसे बड़ा हथियार ‘विकास’ और ‘शिक्षा’ है। आज वो महान शख्सियत हमारे बीच भौतिक रूप से नहीं है, लेकिन उनकी सोच और उनका विजन आज भी करोड़ों भारतीयों के सीने में मशाल बनकर जल रहा है।
मिसाइल मैन, जनता के राष्ट्रपति और हम सबके मार्गदर्शक डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम को सादर नमन!
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