ये गेहूं खरीदी है साहब, विधायक खरीदी नहीं?

भोपाल। मध्यप्रदेश की मंडियों में इन दिनों जो दृश्य देखने को मिल रहा है, वह किसी उत्सव से कम नहीं दिखता कहीं तिलक लगाकर किसानों का स्वागत, कहीं फूल-मालाओं से अभिनंदन, तो कहीं सरकारी व्यवस्थाओं की तारीफ में बड़े-बड़े दावे। लेकिन इस दिखावे के पीछे एक कड़वी सच्चाई छुपी है, जो हर किसान के चेहरे पर साफ झलक रही है। सवाल सीधा है जब सरकार ने गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) 2645 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है, तो आखिर किसान को 400-425 रुपये कम कीमत पर अपनी उपज क्यों बेचनी पड़ रही है?

यह सवाल केवल आर्थिक नहीं है, बल्कि व्यवस्था और नीयत पर भी गंभीर प्रश्न खड़ा करता है।

सरकार के दावों और जमीनी हकीकत के बीच का यह अंतर कोई नया नहीं है, लेकिन इस बार यह अंतर कुछ ज्यादा ही चुभता हुआ नजर आ रहा है। मंडियों में किसान सुबह से लाइन में लगकर अपनी बारी का इंतजार करता है। कई बार तो उसे अपनी फसल बेचने के लिए कई दिन तक चक्कर लगाने पड़ते हैं। ऊपर से तौल में देरी, भुगतान में अनिश्चितता और गुणवत्ता के नाम पर कटौती ये सब मिलकर किसान को मजबूर कर देते हैं कि वह अपनी मेहनत की फसल औने-पौने दाम में व्यापारियों को बेच दे।

सरकार द्वारा तय किया गया एमएसपी एक तरह से किसानों के लिए सुरक्षा कवच होता है, ताकि उन्हें उनकी फसल का न्यूनतम उचित मूल्य मिल सके। लेकिन जब यही सुरक्षा कवच कागजों तक सीमित रह जाए, तो किसान के पास विकल्प ही क्या बचता है?

विडंबना देखिए कि जिस तरह से राजनीतिक गलियारों में “खरीदी” शब्द का इस्तेमाल होता है विधायकों की खरीद-फरोख्त की चर्चाएं उसी शब्द का इस्तेमाल आज किसान अपनी फसल के लिए कर रहा है। फर्क बस इतना है कि वहां कीमतें करोड़ों में तय होती हैं और यहां किसान की मेहनत सैकड़ों रुपये में कुचल दी जाती है।

सरकार के प्रतिनिधि जब मंडी में जाकर किसानों को तिलक लगाते हैं, तो वह एक प्रतीकात्मक सम्मान जरूर लगता है। लेकिन किसान के लिए असली सम्मान उसकी फसल का सही मूल्य है, न कि माथे पर लगाया गया तिलक। अगर उसे 2645 रुपये की जगह 2200 या 2100 रुपये में ही गेहूं बेचना पड़े, तो यह तिलक उसके जख्मों पर मरहम नहीं, बल्कि नमक छिड़कने जैसा लगता है।

यह भी समझना जरूरी है कि किसान के पास अपनी उपज को लंबे समय तक रोककर रखने की सुविधा नहीं होती। उसे कर्ज चुकाना होता है, अगली फसल की तैयारी करनी होती है, घर का खर्च चलाना होता है। ऐसे में वह मजबूरी में कम कीमत पर भी अपनी फसल बेच देता है। यही मजबूरी बाजार के बिचौलियों और सिस्टम की खामियों को ताकत देती है।

मध्यप्रदेश जैसे कृषि प्रधान राज्य में, जहां बड़ी आबादी खेती पर निर्भर है, वहां इस तरह की स्थिति चिंताजनक है। सरकार अगर सच में किसानों के हितों के प्रति गंभीर है, तो उसे केवल घोषणाओं और स्वागत कार्यक्रमों से आगे बढ़कर ठोस कदम उठाने होंगे। मंडियों में पारदर्शिता बढ़ानी होगी, खरीदी प्रक्रिया को सरल और तेज बनाना होगा, और सबसे महत्वपूर्ण एमएसपी पर वास्तविक खरीदी सुनिश्चित करनी होगी।

किसान कोई भीख नहीं मांग रहा है। वह अपनी मेहनत का उचित मूल्य चाहता है। उसकी मांग जायज है और उसका हक भी। लेकिन जब उसे यह हक नहीं मिलता, तो उसके भीतर एक आक्रोश जन्म लेता है जो धीरे-धीरे अविश्वास में बदल जाता है।

आज जरूरत इस बात की है कि सरकार यह समझे कि किसान केवल वोट बैंक नहीं है, बल्कि अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। अगर यही रीढ़ कमजोर हो गई, तो पूरे तंत्र पर उसका असर पड़ेगा।

“ये गेहूं खरीदी है साहब, विधायक खरीदी नहीं”यह सिर्फ एक व्यंग्यात्मक टिप्पणी नहीं है, बल्कि व्यवस्था पर करारा तंज है। यह उस दर्द की आवाज है, जो हर उस किसान के दिल में है, जिसे उसकी मेहनत का पूरा दाम नहीं मिल पा रहा।

सरकार को इस आवाज को सुनना होगा, समझना होगा और उस पर कार्रवाई भी करनी होगी। वरना तिलक और मालाओं के पीछे छुपी यह सच्चाई एक दिन इतना बड़ा सवाल बन जाएगी, जिसका जवाब देना आसान नहीं होगा।

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